कर्क राशि साढ़ेसाती — शुरू और खत्म होने की तारीख
ये तारीखें हर उस व्यक्ति के लिए समान हैं जिसकी चंद्र राशि है कर्क (Cancer). सभी तारीखें भारतीय मानक समय (IST) में। English
शनि मीन में हैं (कर्क से नौवीं राशि) — 3 जून 2027 तक।
शनि की स्थिति केवल नीचे दी गई तारीखों पर बदलती है — यह कार्ड पेज खुलते समय आज की तारीख के लिए गणना करता है।
तीनों चरण, सरल शब्दों में
साढ़ेसाती लगभग साढ़े सात वर्ष का वह समय है जब शनि आपकी (कर्क) से पहले, उस पर और उसके बाद की राशि से गुज़रते हैं। इसे ज़िम्मेदारी और लगातार प्रयास का समय समझें — इसमें बनाई गई नींव लंबे समय तक टिकती है।
शनि मिथुन में — कर्क से बारहवीं राशि। परंपरा में इसे ख़र्च, दूरी और नई व्यवस्था बनाने का समय माना जाता है: बजट पर ध्यान, नींद और दिनचर्या ठीक रखना, और ज़िम्मेदारियाँ धीरे-धीरे संभालना।
शनि कर्क में — आपकी अपनी चंद्र राशि पर। इसे सबसे ज़्यादा मेहनत माँगने वाला, पर सबसे ज़्यादा परिपक्वता देने वाला चरण माना जाता है: धैर्य, अनुशासन और काम को पूरा करना यहाँ सबसे काम आते हैं।
शनि सिंह में — कर्क से दूसरी राशि। परंपरा में यह परिवार, बचत और वाणी से जुड़ा चरण है; पहले की मेहनत का फल यहीं से दिखने लगता है। सोच-समझकर बोलना और बचत बनाए रखना अच्छा माना जाता है।
कर्क राशि की सभी साढ़ेसाती, 1950–2060
हर अवधि शनि के पहले प्रवेश से अंतिम निकास तक चलती है। राशि की सीमा के पास होने पर शनि कुछ महीनों के लिए पीछे लौटते हैं — वे पंक्तियाँ अलग दिखाई गई हैं, ताकि हर निकास और दोबारा प्रवेश दिखे।
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| मिथुन (बारहवीं) | पहला चरण — उदय | 5 अग॰ 1943 | 17 दिस॰ 1943 |
| वृषभ (ग्यारहवीं) | बाहर (वक्री कदम) · वक्री होकर वापसी | 17 दिस॰ 1943 | 23 अप्रैल 1944 |
| मिथुन (बारहवीं) | पहला चरण — उदय | 23 अप्रैल 1944 | 22 सित॰ 1945 |
| कर्क (पहली) | दूसरा चरण — शिखर | 22 सित॰ 1945 | 22 दिस॰ 1945 |
| मिथुन (बारहवीं) | पहला चरण — उदय · वक्री होकर वापसी | 22 दिस॰ 1945 | 8 जून 1946 |
| कर्क (पहली) | दूसरा चरण — शिखर | 8 जून 1946 | 26 जुल॰ 1948 |
| सिंह (दूसरी) | तीसरा चरण — अस्त | 26 जुल॰ 1948 | 20 सित॰ 1950 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| मिथुन (बारहवीं) | पहला चरण — उदय | 10 जून 1973 | 23 जुल॰ 1975 |
| कर्क (पहली) | दूसरा चरण — शिखर | 23 जुल॰ 1975 | 7 सित॰ 1977 |
| सिंह (दूसरी) | तीसरा चरण — अस्त | 7 सित॰ 1977 | 4 नव॰ 1979 |
| कन्या (तीसरी) | बाहर (वक्री कदम) | 4 नव॰ 1979 | 15 मार्च 1980 |
| सिंह (दूसरी) | तीसरा चरण — अस्त · वक्री होकर वापसी | 15 मार्च 1980 | 27 जुल॰ 1980 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| मिथुन (बारहवीं) | पहला चरण — उदय | 23 जुल॰ 2002 | 8 जन॰ 2003 |
| वृषभ (ग्यारहवीं) | बाहर (वक्री कदम) · वक्री होकर वापसी | 8 जन॰ 2003 | 7 अप्रैल 2003 |
| मिथुन (बारहवीं) | पहला चरण — उदय | 7 अप्रैल 2003 | 6 सित॰ 2004 |
| कर्क (पहली) | दूसरा चरण — शिखर | 6 सित॰ 2004 | 13 जन॰ 2005 |
| मिथुन (बारहवीं) | पहला चरण — उदय · वक्री होकर वापसी | 13 जन॰ 2005 | 26 मई 2005 |
| कर्क (पहली) | दूसरा चरण — शिखर | 26 मई 2005 | 1 नव॰ 2006 |
| सिंह (दूसरी) | तीसरा चरण — अस्त | 1 नव॰ 2006 | 10 जन॰ 2007 |
| कर्क (पहली) | दूसरा चरण — शिखर · वक्री होकर वापसी | 10 जन॰ 2007 | 16 जुल॰ 2007 |
| सिंह (दूसरी) | तीसरा चरण — अस्त | 16 जुल॰ 2007 | 10 सित॰ 2009 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| मिथुन (बारहवीं) | पहला चरण — उदय | 31 मई 2032 | 13 जुल॰ 2034 |
| कर्क (पहली) | दूसरा चरण — शिखर | 13 जुल॰ 2034 | 27 अग॰ 2036 |
| सिंह (दूसरी) | तीसरा चरण — अस्त | 27 अग॰ 2036 | 22 अक्टू॰ 2038 |
| कन्या (तीसरी) | बाहर (वक्री कदम) | 22 अक्टू॰ 2038 | 5 अप्रैल 2039 |
| सिंह (दूसरी) | तीसरा चरण — अस्त · वक्री होकर वापसी | 5 अप्रैल 2039 | 13 जुल॰ 2039 |
कर्क राशि की शनि ढैया, 1950–2060
(लघु पनौती) शनि का चंद्र से चौथी (कंटक शनि) या आठवीं (अष्टम शनि) राशि में लगभग ढाई वर्ष का गोचर है — साढ़ेसाती के विषयों का हल्का रूप।
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में | 25 नव॰ 1952 | 24 अप्रैल 1953 |
| कन्या (तीसरी) | बाहर (वक्री कदम) · वक्री होकर वापसी | 24 अप्रैल 1953 | 21 अग॰ 1953 |
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में | 21 अग॰ 1953 | 12 नव॰ 1955 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में | 27 जन॰ 1964 | 9 अप्रैल 1966 |
| मीन (नौवीं) | बाहर (वक्री कदम) | 9 अप्रैल 1966 | 3 नव॰ 1966 |
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में · वक्री होकर वापसी | 3 नव॰ 1966 | 20 दिस॰ 1966 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में | 6 अक्टू॰ 1982 | 21 दिस॰ 1984 |
| वृश्चिक (पाँचवीं) | बाहर (वक्री कदम) | 21 दिस॰ 1984 | 31 मई 1985 |
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में · वक्री होकर वापसी | 31 मई 1985 | 17 सित॰ 1985 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में | 5 मार्च 1993 | 15 अक्टू॰ 1993 |
| मकर (सातवीं) | बाहर (वक्री कदम) · वक्री होकर वापसी | 15 अक्टू॰ 1993 | 10 नव॰ 1993 |
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में | 10 नव॰ 1993 | 2 जून 1995 |
| मीन (नौवीं) | बाहर (वक्री कदम) | 2 जून 1995 | 10 अग॰ 1995 |
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में · वक्री होकर वापसी | 10 अग॰ 1995 | 16 फ़र॰ 1996 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में | 15 नव॰ 2011 | 16 मई 2012 |
| कन्या (तीसरी) | बाहर (वक्री कदम) · वक्री होकर वापसी | 16 मई 2012 | 4 अग॰ 2012 |
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में | 4 अग॰ 2012 | 2 नव॰ 2014 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में | 29 अप्रैल 2022 | 12 जुल॰ 2022 |
| मकर (सातवीं) | बाहर (वक्री कदम) · वक्री होकर वापसी | 12 जुल॰ 2022 | 17 जन॰ 2023 |
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में | 17 जन॰ 2023 | 29 मार्च 2025 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में | 29 जन॰ 2041 | 5 फ़र॰ 2041 |
| कन्या (तीसरी) | बाहर (वक्री कदम) · वक्री होकर वापसी | 5 फ़र॰ 2041 | 26 सित॰ 2041 |
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में | 26 सित॰ 2041 | 12 दिस॰ 2043 |
| वृश्चिक (पाँचवीं) | बाहर (वक्री कदम) | 12 दिस॰ 2043 | 23 जून 2044 |
| तुला (चौथी) | ढैया की राशि में · वक्री होकर वापसी | 23 जून 2044 | 30 अग॰ 2044 |
| शनि राशि | चरण | से | तक |
|---|---|---|---|
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में | 25 फ़र॰ 2052 | 14 मई 2054 |
| मीन (नौवीं) | बाहर (वक्री कदम) | 14 मई 2054 | 2 सित॰ 2054 |
| कुंभ (आठवीं) | ढैया की राशि में · वक्री होकर वापसी | 2 सित॰ 2054 | 5 फ़र॰ 2055 |
आप क्या कर सकते हैं — पहले बिना ख़र्च वाले उपाय
“नुकसान से बचने” के लिए इनमें से कुछ भी ज़रूरी नहीं है। ये शनि काल में अपनाए जाने वाले पारंपरिक, अधिकतर निःशुल्क उपाय हैं, हर एक का स्रोत साथ में। कोई उपाय परिणाम की गारंटी नहीं देता।
शनि आपकी चंद्र राशि से पहले, उस पर, या उसके बाद की राशि में गोचर कर रहे हैं — लगभग साढ़े सात वर्ष का समय। यह धैर्य, नियमितता और लगातार प्रयास माँगता है; बहुत से लोग इसे वह समय मानते हैं जिसने उनकी सबसे मज़बूत नींव बनाई।
यह कितना आम है? हर किसी की आती है — लगभग हर 30 वर्ष में, यानी जीवन में दो-तीन बार। किसी भी समय लगभग 4 में से 1 व्यक्ति साढ़ेसाती में होता है (चंद्र से गिनी 12 में से 3 राशियों में शनि)।
यह अक्सर डर से हल्का क्यों होता है: जब शनि आपके लग्न के लिए मित्र या योगकारक हों (वृषभ और तुला लग्न के लिए शनि योगकारक हैं) या जन्म-कुंडली में अच्छे स्थित हों, तो इसे बहुत हल्का माना जाता है।
आप क्या कर सकते हैं
वैकल्पिक पारंपरिक उपाय — पहले निःशुल्क। कोई भी अनिवार्य नहीं, और कोई भी परिणाम की गारंटी नहीं देता।
1. निःशुल्क, रोज़मर्रा के उपाय
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
Om Praam Preem Praum Sah Shanaishcharaya Namah
संख्या: प्रतिदिन 108 बार (एक माला); पारंपरिक पूर्ण जप संख्या 23,000 · कब: शनिवार शाम
स्रोत: Navagraha beej mantra (traditional graha-japa manuals)नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
Nilanjana samabhasam raviputram yamagrajam, chhaya martanda sambhutam tam namami shanaishcharam
संख्या: दिन में एक या तीन बार — ग्रह के वार पर 11 या 108 बार पाठ भी प्रचलित है · कब: शनिवार
स्रोत: Navagraha Stotra, attributed to Vyasa- हनुमान चालीसा — प्रतिदिन एक बार, या मंगलवार और शनिवार को।स्रोत: Hanuman Chalisa — Goswami Tulsidas
- राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र — शनिवार शाम को।स्रोत: Shani Stotra attributed to King Dasharatha (traditional recitation)
- शनिवार व्रत। सामान्य रूप हल्का व्रत है (एक सादा भोजन, या फल और दूध)। व्रत वैकल्पिक है — गर्भावस्था, बीमारी, बुढ़ापे या दवा चलने पर इसे न करें; मंत्र और सेवा अपने आप में पर्याप्त हैं।स्रोत: Weekday (vara) vrat tradition — each weekday is ruled by its planet
- लगन और ईमानदारी से काम करें, समय के पाबंद रहें और जो शुरू करें उसे पूरा करें — यही शनि के अपने विषय हैं।स्रोत: Practical, constructive habit (no special source needed)
- मज़दूरों, कर्मचारियों और बुज़ुर्गों के साथ न्याय और दया रखें। लाल किताब शराब से दूर रहने की सलाह भी देती है।स्रोत: Lal Kitab (folk remedy tradition)
- मज़दूरों, बुज़ुर्गों, दिव्यांगों या गरीबों की सेवा करें — भोजन, सर्दी में कंबल, या अपना समय — विशेषकर शनिवार को।स्रोत: Lal Kitab (folk remedy tradition)
2. दान
- क्या: काले तिल, सरसों का तेल, काली उड़द दाल, काला वस्त्र या कंबल, लोहे की वस्तुएँकिसे: मज़दूरों, बुज़ुर्गों या गरीबों को, या शनि मंदिर मेंकब: शनिवार, शामस्रोत: Navagraha daan tradition (graha-shanti practice)
3. पूजा / हवन
- शनि मंत्र के साथ पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक घर पर कर सकते हैंकब: शनिवार शामस्वयं करें; पुरोहित की आवश्यकता नहीं।स्रोत: Popular graha–devata tradition (each planet paired with a deity)
- हनुमान चालीसा / हनुमान पूजा घर पर कर सकते हैंकब: शनिवार और मंगलवारशनि काल में व्यापक रूप से पढ़ी जाती है।स्रोत: Hanuman Chalisa — Goswami Tulsidas
- शनि ग्रह शांति (जप और हवन) पुरोहित आवश्यककब: शनिवार या शनि जयंती (ज्येष्ठ अमावस्या), पुरोहित द्वारा चुना गयावैकल्पिक।स्रोत: Graha Shanti / Navagraha puja tradition (Parashari remedial practice, BPHS)
4. परंपरा से जुड़े मंदिर
दर्शन वैकल्पिक है। स्थान दिए गए स्रोतों से जाँचे गए हैं।
- तिरुनल्लार दर्भारण्येश्वर मंदिर (शनीश्वरन)Thirunallar, Karaikal ज़िला, Puducherry (UT)शनि का नवग्रह मंदिर। इसका प्रमुख उत्सव "सनिपेयर्ची" तब मनाया जाता है जब शनि राशि बदलते हैं (लगभग हर ढाई साल)।स्रोत: en.wikipedia.org · en.wikipedia.org
- शनि शिंगणापुर (शनि मंदिर)Shani Shingnapur (Nevasa taluka), Ahilyanagar (Ahmednagar) ज़िला, Maharashtraअपने शनि देव के स्थान के लिए प्रसिद्ध — स्वयंभू काले पत्थर के रूप में।स्रोत: en.wikipedia.org
5. रत्न — सावधानी के साथ
नीलम साढ़ेसाती का सामान्य उपाय नहीं है। इस पर तभी विचार होता है जब आपकी पूरी कुंडली स्वयं शनि का समर्थन करे — साढ़ेसाती पेज इसे केवल तभी दिखाता है — और तब भी योग्य ज्योतिषी की जाँच और थोड़े परीक्षण के बाद ही।
योग्य ज्योतिषी से सलाह लें और पूरी कुंडली की जाँच के बाद ही रत्न पहनें। 18 वर्ष से कम आयु के किसी के लिए कभी नहीं। कम कीमत के उपरत्न भी होते हैं — उनके बारे में पूछें। परंपरा से नया रत्न पहले थोड़े समय परीक्षण के लिए पहना जाता है और ठीक न लगे तो उतार दिया जाता है। रत्न कभी पक्का समाधान नहीं है, और ऊपर दिए निःशुल्क उपायों में किसी रत्न की आवश्यकता नहीं।
आपकी पूरी कुंडली के लिए कौन-सा रत्न (यदि कोई) उपयुक्त है, देखें →6. ज्योतिषी से कब मिलें
अपनी साढ़ेसाती को दशा और लग्न के साथ पढ़वाना हो तो ज्योतिषी से मिलें — एक ही गोचर अलग-अलग कुंडलियों में बहुत अलग अनुभव होता है।
ये पारंपरिक प्रथाएँ चिंतन और मन की शांति के लिए दी गई हैं — कभी पक्की नहीं, कभी अनिवार्य नहीं, और चिकित्सीय, कानूनी या आर्थिक सलाह नहीं। BornClock कोई पूजा या रत्न नहीं बेचता।
शनि लगभग ढाई वर्ष के लिए आपकी चंद्र राशि से चौथी (कंटक) या आठवीं (अष्टम) राशि में हैं। चौथी को घर और काम की दिनचर्या स्थिर करने का, आठवीं को बदलाव और आत्म-चिंतन का समय माना जाता है। यह एक दौर है, कोई दंड नहीं।
यह कितना आम है? आम है: किसी भी समय लगभग 6 में से 1 व्यक्ति के लिए शनि इन 2 राशियों (12 में से) में से एक में होते हैं।
यह अक्सर डर से हल्का क्यों होता है: साढ़ेसाती की तरह, जब शनि आपके लग्न के लिए मित्र या योगकारक हों, या जन्म-कुंडली में अच्छे स्थित हों, तो इसे बहुत हल्का माना जाता है।
आप क्या कर सकते हैं
वैकल्पिक पारंपरिक उपाय — पहले निःशुल्क। कोई भी अनिवार्य नहीं, और कोई भी परिणाम की गारंटी नहीं देता।
1. निःशुल्क, रोज़मर्रा के उपाय
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
Om Praam Preem Praum Sah Shanaishcharaya Namah
संख्या: प्रतिदिन 108 बार (एक माला); पारंपरिक पूर्ण जप संख्या 23,000 · कब: शनिवार शाम
स्रोत: Navagraha beej mantra (traditional graha-japa manuals)नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
Nilanjana samabhasam raviputram yamagrajam, chhaya martanda sambhutam tam namami shanaishcharam
संख्या: दिन में एक या तीन बार — ग्रह के वार पर 11 या 108 बार पाठ भी प्रचलित है · कब: शनिवार
स्रोत: Navagraha Stotra, attributed to Vyasa- हनुमान चालीसा — प्रतिदिन एक बार, या मंगलवार और शनिवार को।स्रोत: Hanuman Chalisa — Goswami Tulsidas
- राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र — शनिवार शाम को।स्रोत: Shani Stotra attributed to King Dasharatha (traditional recitation)
- शनिवार व्रत। सामान्य रूप हल्का व्रत है (एक सादा भोजन, या फल और दूध)। व्रत वैकल्पिक है — गर्भावस्था, बीमारी, बुढ़ापे या दवा चलने पर इसे न करें; मंत्र और सेवा अपने आप में पर्याप्त हैं।स्रोत: Weekday (vara) vrat tradition — each weekday is ruled by its planet
- लगन और ईमानदारी से काम करें, समय के पाबंद रहें और जो शुरू करें उसे पूरा करें — यही शनि के अपने विषय हैं।स्रोत: Practical, constructive habit (no special source needed)
- मज़दूरों, कर्मचारियों और बुज़ुर्गों के साथ न्याय और दया रखें। लाल किताब शराब से दूर रहने की सलाह भी देती है।स्रोत: Lal Kitab (folk remedy tradition)
- मज़दूरों, बुज़ुर्गों, दिव्यांगों या गरीबों की सेवा करें — भोजन, सर्दी में कंबल, या अपना समय — विशेषकर शनिवार को।स्रोत: Lal Kitab (folk remedy tradition)
2. दान
- क्या: काले तिल, सरसों का तेल, काली उड़द दाल, काला वस्त्र या कंबल, लोहे की वस्तुएँकिसे: मज़दूरों, बुज़ुर्गों या गरीबों को, या शनि मंदिर मेंकब: शनिवार, शामस्रोत: Navagraha daan tradition (graha-shanti practice)
3. पूजा / हवन
- शनि मंत्र के साथ पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक घर पर कर सकते हैंकब: शनिवार शामस्वयं करें; पुरोहित की आवश्यकता नहीं।स्रोत: Popular graha–devata tradition (each planet paired with a deity)
- हनुमान चालीसा / हनुमान पूजा घर पर कर सकते हैंकब: शनिवार और मंगलवारशनि काल में व्यापक रूप से पढ़ी जाती है।स्रोत: Hanuman Chalisa — Goswami Tulsidas
- शनि ग्रह शांति (जप और हवन) पुरोहित आवश्यककब: शनिवार या शनि जयंती (ज्येष्ठ अमावस्या), पुरोहित द्वारा चुना गयावैकल्पिक।स्रोत: Graha Shanti / Navagraha puja tradition (Parashari remedial practice, BPHS)
4. परंपरा से जुड़े मंदिर
दर्शन वैकल्पिक है। स्थान दिए गए स्रोतों से जाँचे गए हैं।
- तिरुनल्लार दर्भारण्येश्वर मंदिर (शनीश्वरन)Thirunallar, Karaikal ज़िला, Puducherry (UT)शनि का नवग्रह मंदिर। इसका प्रमुख उत्सव "सनिपेयर्ची" तब मनाया जाता है जब शनि राशि बदलते हैं (लगभग हर ढाई साल)।स्रोत: en.wikipedia.org · en.wikipedia.org
- शनि शिंगणापुर (शनि मंदिर)Shani Shingnapur (Nevasa taluka), Ahilyanagar (Ahmednagar) ज़िला, Maharashtraअपने शनि देव के स्थान के लिए प्रसिद्ध — स्वयंभू काले पत्थर के रूप में।स्रोत: en.wikipedia.org
5. रत्न — सावधानी के साथ
नीलम ढैया का सामान्य उपाय नहीं है — केवल तभी जब पूरी कुंडली शनि का समर्थन करे, योग्य ज्योतिषी की जाँच और थोड़े परीक्षण के बाद।
योग्य ज्योतिषी से सलाह लें और पूरी कुंडली की जाँच के बाद ही रत्न पहनें। 18 वर्ष से कम आयु के किसी के लिए कभी नहीं। कम कीमत के उपरत्न भी होते हैं — उनके बारे में पूछें। परंपरा से नया रत्न पहले थोड़े समय परीक्षण के लिए पहना जाता है और ठीक न लगे तो उतार दिया जाता है। रत्न कभी पक्का समाधान नहीं है, और ऊपर दिए निःशुल्क उपायों में किसी रत्न की आवश्यकता नहीं।
आपकी पूरी कुंडली के लिए कौन-सा रत्न (यदि कोई) उपयुक्त है, देखें →6. ज्योतिषी से कब मिलें
ढैया को अपनी चल रही दशा और लग्न के साथ पढ़वाना हो तो ज्योतिषी से मिलें।
ये पारंपरिक प्रथाएँ चिंतन और मन की शांति के लिए दी गई हैं — कभी पक्की नहीं, कभी अनिवार्य नहीं, और चिकित्सीय, कानूनी या आर्थिक सलाह नहीं। BornClock कोई पूजा या रत्न नहीं बेचता।
साढ़ेसाती से जुड़े प्रश्न — कर्क
कर्क राशि की साढ़ेसाती कब शुरू और कब खत्म होती है?
1950 से 2060 के बीच कर्क राशि की साढ़ेसाती: 5 अगस्त 1943 – 20 सितंबर 1950; 10 जून 1973 – 27 जुलाई 1980; 23 जुलाई 2002 – 10 सितंबर 2009; 31 मई 2032 – 13 जुलाई 2039। हर अवधि शनि के मिथुन में पहले प्रवेश से शुरू होकर सिंह से अंतिम निकास पर खत्म होती है (भारतीय मानक समय)।
कर्क राशि पर शनि ढैया कब होती है?
कंटक शनि (चौथी राशि): 25 नवंबर 1952 – 12 नवंबर 1955; 6 अक्टूबर 1982 – 17 सितंबर 1985; 15 नवंबर 2011 – 2 नवंबर 2014; 29 जनवरी 2041 – 30 अगस्त 2044। अष्टम शनि (आठवीं राशि): 27 जनवरी 1964 – 20 दिसंबर 1966; 5 मार्च 1993 – 16 फ़रवरी 1996; 29 अप्रैल 2022 – 29 मार्च 2025; 25 फ़रवरी 2052 – 5 फ़रवरी 2055।
साढ़ेसाती के तीन चरण क्या हैं?
पहला चरण (उदय) — शनि मिथुन में; दूसरा चरण (शिखर) — शनि कर्क में; तीसरा चरण (अस्त) — शनि सिंह में। हर चरण लगभग ढाई वर्ष का होता है।
तालिका में शनि बीच में बाहर जाकर वापस क्यों आते हैं?
शनि हर वर्ष लगभग साढ़े चार महीने वक्री (उल्टी चाल में दिखते) रहते हैं। राशि की सीमा के पास वक्री होने पर वे कुछ महीनों के लिए पिछली राशि में लौट जाते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं — इसलिए एक ही अवधि में प्रवेश, निकास और दोबारा प्रवेश की अलग-अलग तारीखें दिखती हैं।
क्या साढ़ेसाती हमेशा बुरी होती है?
नहीं। हर व्यक्ति के जीवन में यह लगभग हर 30 वर्ष में आती है। यह ज़िम्मेदारी, अनुशासन और लगातार प्रयास का समय है; बहुत से लोग इसे वह दौर मानते हैं जिसने उनकी सबसे मज़बूत नींव बनाई। असर आपकी पूरी कुंडली और दशा पर भी निर्भर करता है।
साढ़ेसाती में क्या उपाय करें?
सबसे पहले बिना ख़र्च वाले उपाय: शनि मंत्र या हनुमान चालीसा का पाठ, शनिवार को सेवा और ज़रूरतमंदों की मदद, नियमित दिनचर्या और ईमानदार मेहनत। कोई उपाय अनिवार्य नहीं है और कोई भी परिणाम की गारंटी नहीं देता। रत्न केवल योग्य ज्योतिषी से पूरी कुंडली जँचवाने के बाद।
हर तारीख वह क्षण है जब शनि राशि बदलते हैं — BornClock के अपने इंजन (सायन नहीं, निरयन; लाहिड़ी अयनांश — वही इंजन जो आपकी कुंडली बनाता है) से गणना, भारतीय मानक समय में। 1940 से 2071 तक शनि के सभी 112 राशि-परिवर्तन स्विस एफ़ेमेरिस से मिलाए गए; उसी लाहिड़ी पद्धति में सबसे बड़ा अंतर 19 मिनट है। द्रिक पंचांग की शनि गोचर तालिकाओं से भी 12 मिनट के भीतर मेल।
अपनी चंद्र राशि नहीं पता, या अपनी जन्म-जानकारी से तारीखें देखनी हैं?
